ग़ज़ल

उद्बोधन

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
:खोलो वासना के वसन,::नारी नर!
वाणी के बहु रूप, बहु वेश, बहु विभूषण,:खोलो सब, बोलो सब,एक वाणी,--एक प्राण, एक स्वर!वाणी केवल भावों--विचारों की वाहन,:खोलो भेद भावना के मनोवसन::नारी नर!
खोलो जीर्ण विश्वासों, संस्कारों के शीर्ण वसन,रूढ़ियों, रीतियों, आचारों के अवगुंठन,छिन्न करो पुराचीन संस्कृतियों के जड़ बन्धन,--जाति वर्ण, श्रेणि वर्ग से विमुक्त जन नूतनविश्व सभ्यता का शिलान्यास करें भव शोभन;देश राष्ट्र मुक्त धरणि पुण्य तीर्थ हो पावन।मोह पुरातन का वासना है, वासना दुस्तर,:खोलो सनातनता के शुष्क वसन,::नारी नर!
समरांगण बना आज मानव उपचेतन मन,नाच रहे युग युग के प्रेत जहाँ छाया-तन;धर्म वहाँ, कर्म वहाँ, नीति रीति, रूढ़ि चलन,तर्क वाद, सत्व न्याय, शास्त्र वहाँ, षड दर्शन;खंड खंड में विभक्त विश्व चेतना प्रांगण,भित्तियाँ खड़ी हैं वहाँ देश काल की दुर्धर!ध्वंस करो, भ्रंश करो, खँडहर हैं ये खँडहर,:खोलो विगत सभ्यता के क्षुद्र वसन::नारी नर!
नव चेतन मनुज आज करें धरणि पर विचरण,मुक्त गगन में समूह शोभन ज्यों तारागण;प्राणों प्राणों में रहे ध्वनित प्रेम का स्पंदन,जन से जन में रे बहे, मन से मन में जीवन;मानव हो मानव--हो मानव में मानवपनअन्न वस्त्र से प्रसन्न, शिक्षित हों सर्व जन;सुंदर हों वेश, सब के निवास हों सुंदर,:खोलो परंपरा के कुरूप वसन,::नारी नर!
रचनाकाल: दिसंबर’ ३९
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh