ग़ज़ल

धूप का टुकड़ा

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
एक धूप का हँसमुख टुकड़ातरु के हरे झरोखे से झरअलसाया है धरा धूल परचिड़िया के सफ़ेद बच्चे सा!उसे प्यार है भू-रज सेलेटा है चुपके!वह उड़ करकिरणों के रोमिल पंख खोलतरु पर चढ़ओझल हो सकता फिर अमित नील में!लोग समझतेमैं उसको व्यक्तित्व दे रहाकला स्पर्श से!मुझको लगतावही कला को देता निज व्यक्तित्वस्वयं व्यक्तिवान्ज्योतिर्मय जो!भूरज में लिपटा
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