ग़ज़ल

छोड़ द्रुमों की मृदु छाया

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
छोड़ द्रुमों की मृदु छाया,तोड़ प्रकृति से भी माया,::बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन?::भूल अभी से इस जग को!तज कर तरल तरंगों को,इन्द्रधनुष के रंगों को,::तेरे भ्रू भ्रंगों से कैसे बिधवा दूँ निज मृग सा मन?::भूल अभी से इस जग को!कोयल का वह कोमल बोल,मधुकर की वीणा अनमोल,::कह तब तेरे ही प्रिय स्वर से कैसे भर लूँ, सजनि, श्रवण?::भूल अभी से इस जग को!ऊषा-सस्मित किसलय-दल,सुधा-रश्मि से उतरा जल,::ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन?::भूल अभी से इस जग को!
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