ग़ज़ल
आत्मा का चिर-धन
क्या मेरी आत्मा का चिर-धन ?मैं रहता नित उन्मन, उन्मन !
:प्रिय मुझे विश्व यह सचराचर,:त्रिण, तरु, पशु, पक्षी, नर, सुरवर,:सुन्दर अनादि शुभ सृष्टि अमर;
निज सुख से ही चिर चंचल-मन,मैं हुँ परतिपल उन्मन, उन्मन ।
:मैं प्रेमी उच्चाद्रशों का,:संस्कृति के स्वर्गिक-स्पर्शो का,:जीवन के हर्ष-विमर्शों का:
लगता अपुर्ण मानव जीवन,मैं इच्छा से उन्मन, उन्मन !
:जग-जीवन में उल्लास मुझे,:नव-आशा, नव अभिलाष मुझे,:ईश्वर पर चिर विश्वास मुझे;
चाहिए विश्व को नवजीवन,मैं आकुल रे उन्मन, उन्मन ।
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