ग़ज़ल
तितली
नीली, पीली औ’ चटकीलीपंखों की प्रिय पँखड़ियाँ खोल,प्रिय तिली! फूल-सी ही फूलीतुम किस सुख में हो रही डोल?::चाँदी-सा फैला है प्रकाश,::चंचल अंचल-सा मलयानिल,::है दमक रही दोपहरी में::गिरि-घाटी सौ रंगों में खिल!तुम मधु की कुसुमित अप्सरि-सीउड़-उड़ फूलों को बरसाती,शत इन्द्र चाप रच-रच प्रतिपलकिस मधुर गीति-लय में जाती?::तुमने यह कुसुम-विहग लिवास::क्या अपने सुख से स्वयं बुना?::छाया-प्रकाश से या जग के::रेशमी परों का रंग चुना?क्या बाहर से आया, रंगिणि!उर का यह आतप, यह हुलास?या फूलों से ली अनिल-कुसुम!तुमने मन के मधु की मिठास?::चाँदी का चमकीला आतप,::हिम-परिमल चंचल मलयानिल,::है दमक रही गिरि की घाटी::शत रत्न-छाय रंगों में खिल!--चित्रिणि! इस सुख का स्रोत कहाँजो करता निज सौन्दर्य-सृजन?’वह स्वर्ग छिपा उर के भीतर’--क्या कहती यही, सुमन-चेतन?
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