ग़ज़ल

आओ, हम अपना मन टोवें

सुमित्रानंदन पंत · सब कलाम देखें
आओ, अपने मन को टोवें!व्यर्थ देह के सँग मन की भीनिर्धनता का बोझ न ढोवें।
जाति पाँतियों में बहु बट करसामाजिक जीवन संकट वर,स्वार्थ लिप्त रह, सर्व श्रेय केपथ में हम मत काँटे बोवें!
उजड़ गया घर द्वार अचानकरहा भाग्य का खेल भयानकबीत गयी जो बीत गयी, हमउसके लिये नहीं अब रोवें!
परिवर्तन ही जग का जीवनयहाँ विकास ह्रास संग विघटन,हम हों अपनें भाग्य विधातायों मन का धीरज मत खोवें!
साहस, दृढ संकल्प, शक्ति, श्रमनवयुग जीवन का रच उपक्रम,नव आशा से नव आस्था सेनए भविष्यत स्वप्न सजोवें!
नया क्षितिज अब खुलता मन मेंनवोन्मेष जन-भू जीवन में,राग द्वेष के, प्रकृति विकृति केयुग युग के घावों को धोवें!
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