सियारामशरण गुप्त
1895-1963
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
मैं तो वही खिलौना लूंगा मचल गया दीना का लाल
खेल रहा था जिसको लेकर राजकुमार उछाल-उछाल।
यह कृषि कितनों की अन्नदा प्राण-दात्री,
अहह घन! तुम्हारी है रही प्रेम-पात्री।
शुद्ध शांति-जल बरसाओ तुम
उर-क्षेत्र पर हे प्राणेश!
अभागे फूल, मुरझाने लगा तू;
सताया काल से जाने लगा तू।
ये जीव-जंतुगण पा कर तीव्र क्लेश,
हैं हो चुके अहह नीरद! भस्म-शेष।
आज पड़ती है जहाँ मेरी दृष्टि
पाती वहीं नूतन रहस्य सृष्टि
उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ,
हृदय-चिताएँ धधकाकर,
"मैं हूँ कृपण कहाँ आई तू
ले कर जीवन भर की प्यास?
प्रियतम कब आवेंगे,--कब?
कुछ भी देर हुई तो मेरे
हाय! तुम्हारे क्रीड़ा-स्थल इस
मानस में हे हृदयाधार,
इन विटपवरों ने हे मरूत् ! मोदकरी,
सुरभि सतत देके की सु-सेवा तुम्हारी!
स्वर्ण सुमन दे कर न मुझे जब
तुमनें उसको फेंक दिया;
बुझा गया इस गृह प्रदीप को
हाय! अचानक कौन समीर,
पावस का यह घनघटापुंज
कर स्निग्ध धरा का नव निकुंज
देखा, - देख नहीं सकता कुछ,
अन्धकूप का है घेरा।
दूर से आ कर तुम हे गान!
आकुल करते दृदय-मर्म्म को,
संतुष्ट आक पर नित्य रहो सहर्ष,
हे ग्रीष्म, संतत करो उसका प्रकर्ष।
मैं हूँ एक, अनेक शत्रु हैं सम्मुख मेरे
क्रोध, लोभ, मोहादि सदा रहते हैं घेरे।
अरे पलायित भाव, रूठ कर कहाँ गया तू,
ले आया था आज कौन उपहार नया तू?
हम सब के थे प्यारे बापू
सारे जग से न्यारे बापू
करो नाथ, स्वीकार आज इस हृदय-कुसुम को;
करें और क्या भेंट राजराजेश्वर तुमको?
माली! देखो तो तुमने यह
कैसा वृक्ष लगाया है!
यह रात सहसा आ गई,
नभ में अंधेरी छा गई।
इसी कक्ष में, यही लेखनी ले कर इसी प्रकार
बैठा मैं कविता लिखने को जाने कितनी बार।
कैसे पैर बढाऊँ मैं?
इस घन गहन विजन के भीतर
पंख कहाँ से लाऊँ मैं!
अरे, पैर ही क्या कुछ कम हैं!