ग़ज़ल
यात्री-1
कैसे पैर बढाऊँ मैं?इस घन गहन विजन के भीतरमार्ग कहाँ जो जाऊँ मैं?
कुटिल कँटीले झंखाड़ों मेंउत्तरीय उड़कर मेराउलझ उलझ जाता है, इसकोकहाँ-कहाँ सुलझाऊँ मैं?
कहीं धसी है धरा गर्त मेंकहीं चढी है टीलों पर;मुक्त विहग-सा उड़ जाऊँ जोपंख कहाँ से लाऊँ मैं?
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