ग़ज़ल

अपूर्ण यांचा

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
शुद्ध शांति-जल बरसाओ तुमउर-क्षेत्र पर हे प्राणेश!यही प्रार्थना करते रहनाहुआ हमारा था उद्देश्य।
यह परंतु तुमको क्या भाया,पावक ही पावक बरसाया;जीवन-धारण कठिन हो गयाजिसके कारण एक निमेष।
सभी झाड़-झंकाड़ जला के,स्वाद-रूप में उन्हें बना के,वह दाहक-पावकस्वामिन अबस्वयं हो गया है नि:शेष।
अब झट हल का संघर्षण करइष्ट बीज बो दो हे विभुवर।सफल काम करना फिर करकेशांति वारि वर्षा सविशेष।
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