ग़ज़ल
निर्विवेक
संतुष्ट आक पर नित्य रहो सहर्ष,हे ग्रीष्म, संतत करो उसका प्रकर्ष।है कौन हेतु, पर हो कर जो कराल,हो नष्ट भ्रष्ट करते तुम थे तमाल
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