ग़ज़ल

दूरागत गान

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
दूर से आ कर तुम हे गान!आकुल करते दृदय-मर्म्म को,भेद लक्ष्य अनजान।
मूर्छित सी हैं दसो दिशायें,हुई इकट्ठी अयुत निशायें,गली गली में घाट घाट मेंसन्नाटा सुनसान।
बिना साज सज्जा के सजकरभाषा और अर्थ को तज कर,निकल पड़े करने को सहसाकिसका अनुसंधान।
क्षीण कंठ क्या विरह विधुर होआह! करुण तुम मंजु मधुर हो,किसे ज्ञात है, हममें तुममेंहै कब की पहचान।
जगा वेदना को सोते से,यों ही प्राण छोड रोते से,लो, लय होते हो अनंत मेंनिर्म्मम निठुर समान,दूर से आकर तुम हे गान!
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