ग़ज़ल

गूढाशय

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
स्वर्ण सुमन दे कर न मुझे जबतुमनें उसको फेंक दिया;हो कर क्रुद्ध हृदय अपना तबमैंने तुमसे हटा लिया।
सोचा-मैं उपवन में जा करसुमन इन्हें दिखलाऊं ला कर।मैने सारी शक्ति लगा करकण्टक वेष्टन पार किया।
स्वर्ण सुमन दे कर न मुझे जबतुमने उसको फेंक दिया।उपवन भर के श्रेष्ठ सुमन सब,जा कर तोड़ लिये सहसा जब।
समझ तुम्हारा गूढाशय तब,हुआ विशेष कृतज्ञ हिया।स्वर्ण सुमन देकर न मुझे जबतुमनें उसको फेंक दिया।
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