ग़ज़ल

जाग्रत

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
देखा, - देख नहीं सकता कुछ,अन्धकूप का है घेरा।यहाँ कहाँ आ पड़ा हाय रे!यह मैं दुर्विधि का प्रेरा?
व्यर्थ हुआ क्या साधन सारा?सर्प - रज्जु का भी न सहारा,भगवन, हा! यह कैसी कारा?
ऎं यह क्या! - मैं खड़ा हो गया;कहाँ गया वह भय मेराओ जागृत वह स्वप्न मात्र थापथ है खुला पड़ा तेरा!
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.