ग़ज़ल

मृत्यु भय

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
यह रात सहसा आ गई,नभ में अंधेरी छा गई।सोना पड़ेगा अब हमेंये कार्य तज कर सब हमें।
हैं कार्य पूर्ण न एक भी,किस भाँति सो जावें अभी।क्या नींद अच्छी आयगी,यह रात यों ही जायगी।
दु:स्वप्न दुख पहुँचायँगे,क्या शांति झँप कर पायँगे?हे नाथ, लें न विराम हम,दिन भर करें बस काम हम।
सन्ध्या समय एसे थकें,हम नींद गहरी ले सकें,जिसमें कि हम फिर जब जगें,सोत्साह कार्यों में लगें।
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