ग़ज़ल

एक फूल की चाह

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ,हृदय-चिताएँ धधकाकर,महा महामारी प्रचण्ड होफैल रही थी इधर उधर।
क्षीण-कण्ठ मृतवत्साओं काकरुण-रुदन दुर्दान्त नितान्त,भरे हुए था निज कृश रव मेंहाहाकार अपार अशान्त।
बहुत रोकता था सुखिया को'न जा खेलने को बाहर',नहीं खेलना रुकता उसकानहीं ठहरती वह पल भर।
मेरा हृदय काँप उठता था,बाहर गई निहार उसे;यही मानता था कि बचा लूँकिसी भांति इस बार उसे।
भीतर जो डर रहा छिपाये,हाय! वही बाहर आया।एक दिवस सुखिया के तनु कोताप-तप्त मैंने पाया।
ज्वर से विह्वल हो बोली वह,क्या जानूँ किस डर से डर -मुझको देवी के प्रसाद काएक फूल ही दो लाकर।
बेटी, बतला तो तू मुझकोकिसने तुझे बताया यह;किसके द्वारा, कैसे तूनेभाव अचानक पाया यह?
मैं अछूत हूँ, मुझे कौन हा!मन्दिर में जाने देगा;देवी का प्रसाद ही मुझकोकौन यहाँ लाने देगा?
बार बार, फिर फिर, तेरा हठ!पूरा इसे करूँ कैसे;किससे कहे कौन बतलावे,धीरज हाय! धरूँ कैसे?
कोमल कुसुम समान देह हा!हुई तप्त अंगार-मयी;प्रति पल बढ़ती ही जाती हैविपुल वेदना, व्यथा नई।
मैंने कई फूल ला लाकररक्खे उसकी खटिया पर;सोचा - शान्त करूँ मैं उसको,किसी तरह तो बहला कर।
तोड़-मोड़ वे फूल फेंक सबबोल उठी वह चिल्ला कर -मुझको देवी के प्रसाद काएक फूल ही दो लाकर!
क्रमश: कण्ठ क्षीण हो आया,शिथिल हुए अवयव सारे,बैठा था नव-नव उपाय कीचिन्ता में मैं मनमारे।
जान सका न प्रभात सजग सेहुई अलस कब दोपहरी,स्वर्ण-घनों में कब रवि डूबा,कब आई सन्ध्या गहरी।
सभी ओर दिखलाई दी बस,अन्धकार की छाया गहरी।छोटी-सी बच्ची को ग्रसनेकितना बड़ा तिमिर आया!
ऊपर विस्तृत महाकाश मेंजलते-से अंगारों से,झुलसी-सी जाती थी आँखेंजगमग जगते तारों से।
देख रहा था - जो सुस्थिर होनहीं बैठती थी क्षण भर,हाय! बही चुपचाप पड़ी थीअटल शान्ति-सी धारण कर।
सुनना वही चाहता था मैंउसे स्वयं ही उकसा कर -मुझको देवी के प्रसाद काएक फूल ही दो लाकर!
हे मात:, हे शिवे, अम्बिके,तप्त ताप यह शान्त करो;निरपराध छोटी बच्ची यह,हाय! न मुझसे इसे हरो!
काली कान्ति पड़ गई इसकी,हँसी न जाने गई कहाँ,अटक रहे हैं प्राण क्षीण तरसाँसों में ही हाय यहाँ!
अरी निष्ठुरे, बढ़ी हुई हीहै यदि तेरी तृषा नितान्त,तो कर ले तू उसे इसी क्षणमेरे इस जीवन से शान्त!
मैं अछूत हूँ तो क्या मेरीविनती भी है हाय! अपूत,उससे भी क्या लग जावेगीतेरे श्री-मन्दिर को छूत?
किसे ज्ञात, मेरी विनती वहपहुँची अथवा नहीं वहाँ,उस अपार सागर का दीखापार न मुझको कहीं वहाँ।
अरी रात, क्या अक्ष्यता कापट्टा लेकर आई तू,आकर अखिल विश्व के ऊपरप्रलय-घटा सी छाई तू!
पग भर भी न बढ़ी आगे तूडट कर बैठ गई ऐसी,क्या न अरुण-आभा जागेगी,सहसा आज विकृति कैसी!
युग के युग-से बीत गये हैं,तू ज्यों की त्यों है लेटी,पड़ी एक करवट कब से तू,बोल, बोल, कुछ तो बेटी!
वह चुप थी, पर गूँज रही थीउसकी गिरा गगन-भर भर -'मुझको देवी के प्रसाद का -एक फूल तुम दो लाकर!'
"कुछ हो देवी के प्रसाद काएक फूल तो लाऊँगा;हो तो प्रात:काल, शीघ्र हीमन्दिर को मैं जाऊँगा।
तुझ पर देवी की छाया हैऔर इष्ट है यही तुझे;देखूँ देवी के मन्दिर मेंरोक सकेगा कौन मुझे।"
मेरे इस निश्चल निश्चय नेझट-से हृदय किया हलका;ऊपर देखा - अरुण राग सेरंजित भाल नभस्थल का!
झड़-सी गई तारकावलि थीम्लान और निष्प्रभ होकर;निकल पड़े थे खग नीड़ों सेमानों सुध-बुध सी खो कर।
रस्सी डोल हाथ में लेकरनिकट कुएँ पर जा जल खींच,मैंने स्नान किया शीतल हो,सलिल-सुधा से तनु को सींच।
उज्वल वस्र पहन घर आकरअशुचि ग्लानि सब धो डाली।चन्दन-पुष्प-कपूर-धूप सेसजली पूजा की थाली।
सुकिया के सिरहाने जाकरमैं धीरे से खड़ा हुआ।आँखें झँपी हुई थीं, मुख भीमुरझा-सा था पड़ा हुआ।
मैंने चाहा - उसे चूम लें,किन्तु अशुचिता से डर करअपने वस्त्र सँभाल, सिकुड़करखड़ा रहा कुछ दूरी पर।
वह कुछ कुछ मुसकाई सहसा,जाने किन स्वप्नों में लग्न,उसकी वह मुसकाहट भी हा!कर न सकी मुझको मुद-मग्न।
अक्षम मुझे समझकर क्या तूहँसी कर रही है मेरी?बेटी, जाता हूँ मन्दिर मेंआज्ञा यही समझ तेरी।
उसने नहीं कहा कुछ, मैं हीबोल उठा तब धीरज धर -तुझको देवी के प्रसाद काएक फूल तो दूँ लाकर!
ऊँचे शैल-शिखर के ऊपरमन्दिर था विस्तीर्ण विशाल;स्वर्ण-कलश सरसिज विहसित थेपाकर समुदित रवि-कर-जाल।
परिक्रमा-सी कर मन्दिर की,ऊपर से आकर झर झर,वहाँ एक झरना झरता थाकल-कल मधुर गान कर-कर।
पुष्प-हार-सा जँचता था वह
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.