ग़ज़ल
माली के प्रति
माली! देखो तो तुमने यहकैसा वृक्ष लगाया है!कितना समय हो गया, इसमेंनहीं फूल भी आया है!
निकल गये कितने वसंत हैं,बरसातें भी बीत गईं;किंतु प्रफुल्लित इसे किसी नेंअब तक नहीं बनाया है!
साथ छोड़ती जाती है सबशाखा आदि रुखाई से।शुष्क हुए पत्तों को इसनेंइधर-उधर छितराया है।
अतुल तुम्हारे इस उपवन कीइससे भी कुछ शोभा है?क्या निज कौशल दिखलाने कोइसे यहाँ उपजाया है।
अरे, काट ही डालो इसकोअथवा हरा भरा कर दो,कहें सभी आहा! तुमने वहकैसा वृक्ष लगाया है!
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.