ग़ज़ल

पलायित

सियारामशरण गुप्त · सब कलाम देखें
अरे पलायित भाव, रूठ कर कहाँ गया तू,ले आया था आज कौन उपहार नया तू?मैं था अन्यमनस्क कि एसे में तू आया,छली, तुझे मैं भली भाँति पहचान न पाया।
आया था क्या कुशलकथा ले नन्दनवन से;सुमन नयन कर या कि शुभाषा के कानन से;या कि भविष्यत-जालवेध कुल लाया था तू;आगामी कुछ दृश्य देख कर आया था तू;
या वार्तावह बना चाहता था तू मेरादूर लोक के लिये; इष्ट, क्या था यह तेरा?बीच मार्ग से लौट गया क्यों निर्मम बन तू;मेरा विषम विषाद और कर गया सघन तू।
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.