फ़िराक़ गोरखपुरी

फ़िराक़ गोरखपुरी

1896-1982
रघुपति सहाय फ़िराक़ गोरखपुरी उर्दू और हिन्दी के प्रसिद्ध शायर और आलोचक थे।
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Famous Works

अगर बदल न दिया आदमी ने दुनियाँ को,तो जान लो कि यहाँ आदमी कि खैर नहीं.
अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूँ ही कभी लब खोले हैंपहले "फ़िराक़" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं
अब तो हम हैं और भरी दुनियाँ की हैं तनहाईयाँ."याद थीं हमको भी रंगारंग बज़्म अमराईयाँ ".
अरे ख्वाबे-मुहब्बत की भी क्या ता'बीर होती है.खुलें आँखे तो दुनिया दर्द की तस्वीर होती है.
आ ही जाती है मगर फिर भी मेरे दर्द की याद.गरचे है तर्के-मोहब्बत१ में भी आराम बहुत.
१.सियाह पेड़ हैं अब आप अपनी परछाईं
आह वो मंज़िले-मुराद,दूर भी है क़रीब भी.देर हुई कि क़ाफ़िले उसकी तरफ़ रवाँ नहीं.
इश्क़-बेबाक को रोके हुए है और ही कुछ,ख़्वाब-आलूदा निगाहें तेरी बेदार सही.
इश्क़ तो दुनिया का राजा है.किस कारन वैराग लिया है.
इस सुकूते-फ़िज़ा में खो जाएंआसमानों के राज़ हो जाएं
उमीदे-मर्ग कब तक ज़ि‍न्दगी का दर्दे-सर कब तकये माना सब्र करते हैं महब्बत में मगर कब तक
उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगीइक नागन-सी लहराने लगी
ए ज़ज़्बे निहां और कोई है कि वही हैखिलवत कदा ए दिल में आवाज हुई है
कभी जब तेरी याद आ जाये हैदिलों पर घटा बन के छा जाये है
कर गई काम वो नज़र, गो उसे आज देखकर.दर्द भी उठ सका नहीं,रंग भी उड़ सका नहीं.
किस तरफ़ से आ रही है आज पैहम बू-ए-दोस्त.ऐ सबा,बिखरे हैं किस अन्दाज़ से गेसू-ए दोस्त.
किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भीये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी
संग-ओ-आहन बेनियाज़-ए-ग़म नहींदेख हर दीवार-ओ-दर से सिर न मार
कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हमउस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम
तेरे आने की महफ़िल ने जो कुछ आहट-सी पाई है,हर इक ने साफ़ देखा शमअ की लौ थरथराई है.
क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में नमनाक हैं पलकेंक्यों याद तेरी आते ही तारे निकल आए
ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होनाअलग़रज़ हुस्न को रुसवा किसी उनवाँहोना
खो के इक शख्स को हम पूछते फिरते हैं यही.जिसकी तकदीर बिगड़ जाए वो करता क्या है ?
गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैंआप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं
छ्लक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहींनिगाहे-नरगिसे-राना, तेरा जवाब नहीं
छिड़ गये साज़े-इश्क़ के गानेखुल गये ज़िन्दगी के मयख़ाने
जब नजर आप की हो गई हैज़िन्दगी, ज़िन्दगी हो गई है
ज़िन्दगी क्या है,ये मुझसे पूछते हो दोस्तों.एक पैमाँ१ है जो पूरा होके भी न पूरा हो.
जिससे कुछ चौंक पड़ें सोई हुई तकदीरें.आज होता है उन आँखों का इशारा भी कहाँ !
जो दिलो-जिगर में उतर गई वो निगाहे-यार कहाँ है अब ?कोई हद है ज़ख्मे-निहाँ की भी कि हयात वहमो गुमाँ है अब
जो बात है हद से बढ़ गयी हैवाएज़ के भी कितनी चढ़ गई है
जो भूलतीं ही नहीं,याद भी नहीं आतीं .तेरी निगाह ने क्यों वो कहानियाँ न कहीं .
डरता हूँ कामियाबी-ए-तकदीर१ देखकर.यानी सितमज़रीफ़ी-ए-तकदीर२ देखकर.
तमाम कैफ़ ख़मोशी तमाम नग़्म-ए-साज़नवा-ए-राज़ है ऐ दोस्त या तेरी आवाज़
तहों में दिल के जहां कोई वारदात हुईहयाते-ताज़ा से लबरेज़ कायनात हुई