ग़ज़ल
जब नज़र आप की हो गई है
जब नजर आप की हो गई हैज़िन्दगी, ज़िन्दगी हो गई है
बारहा बर-खिलाफ़-ए-हर-उम्मीददोस्ती, दुश्मनी हो गई है
है वो तकमील पुरकारियों कीजो मेरी सादगी हो गई है
तेरी हर पुरशिश-ओ-मेहरबानीअब मेरी बेकसी हो गई है
भूल बैठा है तू कह के जो बातवो मेरी ज़िन्दगी हो गई है
बज़्म में आंख उठाने की तक्सीरऐ फ़िराक, आज भी हो गई है
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