ग़ज़ल
जो दिलो-जिगर में उतर गई
जो दिलो-जिगर में उतर गई वो निगाहे-यार कहाँ है अब ?कोई हद है ज़ख्मे-निहाँ की भी कि हयात वहमो गुमाँ है अब
मिली इश्क़ को वो हयाते नौ कि आदम का जिसमें सुकून हैये हैं दर्द की नई मंज़िलें न ख़लिश न सोज़े-निहाँ है अब
कभी थीं वो उठती जवानियाँ कि गुबारे-राह नुजूम थेन बुलंदियाँ वो नज़र में हैं न वो दिल की बर्के-तपाँ है अब
जिन्हें ज़िन्दगी का मज़ाक था, वही मौत को भी समझ सकेन उमीदो-बीम के मरहले में ख्याले-सूदो-ज़ियाँ है अब
न वो हुस्नो इश्क़ की सोहबत न वो मजरे न वो सानिहेन वो बेकसों का सुकूते-ग़म न किसी को तेग़े-ज़बाँ है अब
ये फ़िराक़ है कि विसाल है कि ये महवियत का कमाल हैवो ख्याले-यार कहाँ है अब वो जमले-यार कहाँ है अब
मुझे मिट के भी तो सुकूँ नहीं कि ये हालतें भी बदल चलींजिसे मौत समझे थे इश्क़ में, वो मिसाले-उम्रे-रवाँ है अब ?
वो निगाह उठ के पलट गयी, वो शरारे उड़ के निहाँ हुएजिसे दिल समझते थे आज तक वो 'फ़िराक़' उठता धुआँ है अब
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