ग़ज़ल
अगर बदल न दिया
अगर बदल न दिया आदमी ने दुनियाँ को,तो जान लो कि यहाँ आदमी कि खैर नहीं.
हर इन्किलाब के बाद आदमी समझता है,कि इसके बाद न फिर लेगी करवटें ये ज़मीं.
बहुत न बेकसी-ए-इश्क़ पर कोई रोये,कि हुस्न का भी ज़माने में कोई दोस्त नहीं.
अगर तलाश करें,क्या नहीं है दुनियाँ में,जुज़ एक ज़िन्दगी कि तरह ज़िन्दगी कि नहीं.
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh