ग़ज़ल

ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होनाअलग़रज़ हुस्न को रुसवा किसी उनवाँहोना
यूँ तो अकसीर है ख़ाके-दरे-जानाँलेकिनकाविशे-ग़म से उसे गर्दिशे-दौराँ होना
हद्दे-तमकीं से न बाहर हुई खु़द्दार निगाहआज तक आ न सका हुस्न को हैराँ होना
चारागर दर्द सरापा हूँ मेरे दर्द नहींबावर आया तुझे नश्तर का रगे-जाँ होना
दफ़्तरे-राज़े-महब्बत था मलाले-दिल परवो सुकूते-निगहे-नाज़ का पुरसाँ होना
सर-बसर बर्के़-फ़ना इश्क़ के जलवे हैं 'फ़ि‍राक़'ख़ानाए-दिल को न आबाद न वीराँ होना।
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