ग़ज़ल

अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं

फ़िराक़ गोरखपुरी · सब कलाम देखें
अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूँ ही कभी लब खोले हैंपहले "फ़िराक़" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं
दिन में हम को देखने वालो अपने-अपने हैं औक़ाबजाओ न तुम इन ख़ुश्क आँखों पर हम रातों को रो ले हैं
फ़ितरत मेरी इश्क़-ओ-मोहब्बत क़िस्मत मेरी तन्हाईकहने की नौबत ही न आई हम भी कसू के हो ले हैं
बाग़ में वो ख़्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों परडाली डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं
उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंदेंहाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गाँ जब फ़ितने पर तोले हैं
इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होये है नदीमख़ल्वत में वो नर्म उँगलियाँ बंद-ए-क़बा जब खोले हैं
ग़म का फ़साना सुनने वालो आख़िर्-ए-शब आराम करोकल ये कहानी फिर छेड़ेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं
हम लोग अब तो पराये-से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-"फ़िराक़"अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं
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