ग़ज़ल
आह वो मंजिले-मुराद
आह वो मंज़िले-मुराद,दूर भी है क़रीब भी.देर हुई कि क़ाफ़िले उसकी तरफ़ रवाँ नहीं.
दैरो-हरम है गर्दे-राह,नक्शे-क़दम हैं मेहरो-माह.इनमें कोई भी इश्क़ की मंज़िले-कारवाँ नहीं.
किसने सदा-ए-दर्द दी,किसकी निगाह उठ गई.अब वो अदम अदम नहीं,अब ये जहाँ जहाँ नहीं.
आज कुछ इस तरह खुला,राज़े-सुकूने-दाइमी.इश्क़ को भी खुशी नहीं,हुस्न भी शादमाँ नहीं.
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