ग़ज़ल
छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं
छ्लक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहींनिगाहे-नरगिसे-राना, तेरा जवाब नहीं
ज़मीन जाग रही है कि इन्क़लाब है कलवो रात है कि कोई ज़र्रा भी महवे-ख़्वाब नहीं
ज़मीन उसकी, फ़लक उसका, कायनात उसकीकुछ ऐसा इश्क़ तेरा ख़ानमा ख़राब नहीं
जो तेरे दर्द से महरूम हैं यहाँ उनकोग़मे- ज़हाँ भी सुना है कि दस्तयाब नहीं
अभी कुछ और हो इन्सान का लहू पानीअभी हयात के चेहरे पे आबो-ताब नहीं
दिखा तो देती है बेहतर हयात के सपनेख़राब हो के भी ये ज़िन्दगी ख़राब नहीं
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