ग़ज़ल
जिससे कुछ चौंक पड़ें
जिससे कुछ चौंक पड़ें सोई हुई तकदीरें.आज होता है उन आँखों का इशारा भी कहाँ !
मैं ये कहता हूँ कि अफ़लाक से आगे हूँ बहुत.इश्क़ कहता है अभी दर्दे-दिल उठ्ठा भी कहाँ.
राज़दाँ हाले-मोहब्बत का नहीं मैं, लेकिन.तुमने पूछा भी कहाँ,मैंने बताया भी कहाँ.
तज़करा उस निगहे-नाज़ का दिल वालों में कहाँ.दोस्तों,छेड़ दिया तुमने ये किस्सा भी कहाँ.
तेरा अंदाज़े-तगाफुल है खुला राज़,मगर.इश्क़ की आँखों से उठता है ये पर्दा भी कहाँ.
ज़ब्त की ताब न थी फिरते ही वो आँख 'फिराक़'.आज पैमाना-ए-दिल हाथ से छूटा भी कहाँ.
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