आरज़ू लखनवी

आरज़ू लखनवी

1873-1951
दीवान पढ़ें (Read Diwan)

Famous Works

अब मुझ को फ़ायदा हो दवा-ओ-दुआ से क्या?वो मुँह पे कह गए--"यह मर्ज़ लाइलाज है"॥
अलअमाँ मेरे ग़मकदे की शाम।सुर्ख़ शोअ़ला सियाह हो जाये॥
आ गई मंज़िले-मुराद, बाँगेदरा को भूल जा।ज़ाते-खु़दा में यूँ हो महव, नामे-ख़ुदा को भूल जा॥
आके क़ासिद ने कहा जो, वही अकसर निकला।नामाबर समझे थे हम, वह तो पयम्बर निकला॥
आफ़त में पडे़ दर्द के इज़हार से हम और।याद आ गये भूले हुए कुछ उसको सितम और॥
इक जाम-ए-बोसीदा हस्ती और रूह अज़ल से सौदाई।यह तंग लिबास न यूँ चढ़ता ख़ुद फाड़ के हमने पहना है॥
उठ खडा़ हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार।ख़ाक होकर भी वही शान है, दीवाने की॥
क़फ़स से ठोकरें खाती नज़र जिस नख़्ल तक पहुँची।उसी पर लेके इक तिनका बिनाए-आशियाँ रख दी॥
क़रीबेसुबह यह कहकर अज़ल ने आँख झपका दी।"अरे ओ हिज्र के मारे, तुझे अब तक न ख़्वाब आया"॥
क्यों उसकी यह दिलजोई दिल जिसका दुखाना है।ठहरा के निशाने को क्या तीर लगाना है॥
क्यों किसी रहबर से पूछूँ अपनी मंज़िल का पता।मौजे-दरिया खु़द लगा लेती है साहिल का पता॥
खुदारा ! न दो बदगुमानी का मौक़ा।कहलवा के औरों से पैग़ाम अपना॥
खुद चले आओ या बुला भेजो।रात अकेले बसर नहीं होती॥
जवाब देने के बदले वे शक्ल देखते हैं।यह क्या हुआ ,मेरे चेहरे को, अर्ज़ेहाल के बाद॥
ज़माने से नाज़ अपने उठवानेवाले।मुहब्बत का बोझ आप उठाना पड़ेगा॥
जादह-ओ-मंज़िल जहाँ दोनों हैं एक।उस जगह से मेरा सेहरा शुरू॥
जिसमें कैफ़ेग़म नहीं, बाज़ आये ऐसे दिल से हम।यह भी देना है कोई? मय तो न दी, साग़र दिया॥
जो कोई हद हो मुअ़य्यन तो शौक़, शौक़ नहीं।वो कमयाब है जो कमयाब हो न सका॥
जो दर्द मिटने-मिटते भी मुझको मिटा गया।क्या उसका पूछना कि कहाँ था कहाँ न था॥
जो मेरी सरगुज़िश्त सुनते हैं।सर को दो-दो पहर यह धुनते हैं॥
तुम हो कि एक तर्ज़े-सितम पर नहीं क़रार।हम हैं कि पायेबन्द हरेक इम्तहाँ के हैं॥
दिल का जिस शख़्स के पता पाया।उसको आफ़त में मुब्तला पाया॥
दो घडी़ को दे-दे कोई अपनी आँखों की जो नींद।पाँव फैला दूँ गली में तेरी सोने के लिए॥
न यह कहो "तेरी तक़दीर का हूँ मैं मालिक।बनो जो चाहो ख़ुदा के लिए, ख़ुदा न बनो॥
नादाँ की दोस्ती में जी का ज़रर न जाना।इक काम कर तो बैठे, और हाय कर न जाना॥