ग़ज़ल

दो घड़ी को दे दे कोई अपनी आँखों की जो नींद

आरज़ू लखनवी · सब कलाम देखें
दो घडी़ को दे-दे कोई अपनी आँखों की जो नींद।पाँव फैला दूँ गली में तेरी सोने के लिए॥
मिट भी सकती थी कहीं, बेरोये छाती की जलन।आग को पिघला लिया फाहा भिगोने के लिए॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.