ग़ज़ल
ख़ुदारा! न दो बदगुमानी का मौका
खुदारा ! न दो बदगुमानी का मौक़ा।कहलवा के औरों से पैग़ाम अपना॥
हविसकार आशिक भी ऐसा है जैसे--वह बन्दा कि रख ले ख़ुदा नाम अपना॥
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