ग़ज़ल
इक जाम-ए-बोसीदा हस्ती और रूह अज़ल से सौदाई
इक जाम-ए-बोसीदा हस्ती और रूह अज़ल से सौदाई।यह तंग लिबास न यूँ चढ़ता ख़ुद फाड़ के हमने पहना है॥
हिचकी में जो उखड़ी साँस अपनी घबरा के पुकारी याद उसकी।"फिर जोड़ ले यह टूटा रिश्ता इक झटका और भी सहना है"॥
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