ग़ज़ल

उठ खड़ा हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार

आरज़ू लखनवी · सब कलाम देखें
उठ खडा़ हो तो बगोला है, जो बैठे तो गु़बार।ख़ाक होकर भी वही शान है, दीवाने की॥
‘आरज़ू’! ख़त्म हक़ीक़त पै हुआ दौरे-मजाज़।डाली काबे की बिना, आड़ से बुतख़ाने की॥
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