ग़ज़ल
जो कोई हद हो मुअ़य्यन तो शौक़, शौक़ नहीं
जो कोई हद हो मुअ़य्यन तो शौक़, शौक़ नहीं।वो कमयाब है जो कमयाब हो न सका॥
बुरी सरिश्त न बदली जगह बदलने से।चमन में आके भी काँटा गुलाब हो न सका॥... .... ...
उदू न भी मगर अन्धी ज़रूर थी बिजली।कि देखे फूल न पत्ते न आशियाँ देखा॥
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