ग़ज़ल
जो दर्द मिटते मिटते भी मुझको मिटा गया
जो दर्द मिटने-मिटते भी मुझको मिटा गया।क्या उसका पूछना कि कहाँ था कहाँ न था॥
अब तक चारासाज़िये-चश्मेकरम है याद।फाहा वहाँ लगाते थे, चरका जहाँ न था॥
स्रोत-सत्यापन प्रतीक्षित — This text is pending verification against an authoritative source and may contain errors.