ग़ज़ल

जो दर्द मिटते मिटते भी मुझको मिटा गया

आरज़ू लखनवी · सब कलाम देखें
जो दर्द मिटने-मिटते भी मुझको मिटा गया।क्या उसका पूछना कि कहाँ था कहाँ न था॥
अब तक चारासाज़िये-चश्मेकरम है याद।फाहा वहाँ लगाते थे, चरका जहाँ न था॥
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