हसरत मोहानी
1875-1951
फ़ज़लुल हसन हसरत मोहानी उर्दू शायर, स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ थे।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
अब तो उठ सकता नहीं आँखों से बार-ए-इंतज़ार
किस तरह काटे कोई लैल-ओ-नहार-ए-इंतज़ार
इश्क़े-बुताँ को जी का जंजाल कर लिया है
आख़िर में मैंने अपना क्या हाल कर लिया है
और भी हो गए बेग़ाना वो गफ़लत करके
आज़माया जो उन्हें तर्के-मुहब्बत करके
कैसे छुपाऊँ राज़-ए-ग़म दीदा-ए-तर को क्या करूँ.
दिल की तपिश को क्या करूँ सोज़-ए-जिगर को क्या करूँ.
हुस्ने-बेपरवा को ख़ुदबीनओ ख़ुदारा कर दिया
क्या किया मैंने कि इज़हारे-तमन्ना कर दिया
ख़ू समझ में नहीं आती तेरे दीवानों की
जिनको दामन की ख़बर है न गिरेबानों की
घिर के आख़िर आज बरसी है घटा बरसात की
मैकदों में कब से होती थी दुआ बरसात की
चुपके-चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है
हमको अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है
चेहराए-यार से नक़ाब उठा
दिल से इक शोरे-इज़्तराब उठा
जज़्ब-ए-कामिल को असर अपना दिखा देना था
मेरे पहलू में उन्हें ला के बिठा देना था
जो वो नज़र-बा-सरे लुत्फ़ आम हो जाये
अजब नहीं कि हमारा भी काम हो जाये
तोड़ कर अहद-ए-क़रम न-आशना हो जाइए
बंदा परवर जाइए अच्छा ख़फा हो जाइए
देखना भी तो उन्हें दूर से देखा करना
शेवा-ए-इश्क़ नहीं हुस्न को रुसवा करना
फिर भी है तुमको मसीहाई का दावा देखो
मुझको देखो मेरे मरने की तमन्ना देखो
बदल-ए-लज़्ज़ते-आज़ार कहाँ से लाऊँ
अब तुझे ऐ सितमे-यार कहाँ से लाऊँ
बाम पर आने लगे वो सामना होने लगा
अब तो इज़हारे-महब्बत बरमला होने लगा
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं
इलाही तर्के-उल्फ़त पर वो क्योंकर याद आते हैं
मय-ओ-मीना से यारियाँ न गईं
मेरी परहेज़गारियाँ न गईं
मस्ती के फिर आ गये ज़माने
आबाद हुए शराबख़ाने
मातम न हो क्यों भारत में बपा दुनिया से सिधारे आज तिलक
बलवन्त तिलक, महराज तिलक, आज़ादों के सरताज तिलक
याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त के मज़े
दिल अभी भूला नहीं आग़ाज़-उल्फ़त के मज़े
रोशन जमाल-ए-यार से है अंजुमन तमाम
दहका हुआ है आतिश-ए-गुल से चमन तमाम
वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं
आरज़ूओं से फिरा करती हैं तक़दीरेंकहीं
वो जब ये कहते हैं तुझ से ख़ता ज़रूर हुई
मैं बे-क़सूर भी कह दूँ कि हाँ ज़रूर हुई
शिकवए-ग़म तेरे हुज़ूर किया
हमने बेशक बड़ा क़ुसूर किया
सब हैं तेरी अंजुमन में बेहोश
नज़्ज़ाराए-हुस्न का किसे होश
सब्र मुश्किल है, ज़ब्त है दुशवार
दिले-वहशी है और जुनूने-बहार
सियहकार थे बासफ़ा हो गए हम
तेरे इश्क़ में क्या से क्या हो गए हम
हाले-मजबूरिए-दिल की निगराँ ठहरी है
देखना वह निगहे-नाज़ कहाँ ठहरी है
है मश्क़े-सुख़नजारी, चक्की की मशक़्क़त भी
इक तरफ़ातमाशा है हसरत की तबीयत भी