ग़ज़ल

अब तो उठ सकता नहीं आँखों से बार-ए-इंतेज़ार

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
अब तो उठ सकता नहीं आँखों से बार-ए-इंतज़ारकिस तरह काटे कोई लैल-ओ-नहार-ए-इंतज़ार
उन की उल्फ़त का यक़ीन हो उन के आने की उम्मीदहों ये दोनों सूरतें तब है बहार-ए-इंतज़ार
मेरी आहें ना-रसा मेरी दुआएँ ना-क़बूलया इलाही क्या करूँ मैं शर्म-सार-ए-इंतज़ार
उन के खत की आरज़ू है उन के आमद का ख़यालकिस क़दर फैला हुआ है कारोबार-ए-इंतज़ार
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