ग़ज़ल
याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त के मज़े
याद हैं सारे वो ऐशे-बा-फ़राग़त के मज़ेदिल अभी भूला नहीं आग़ाज़-उल्फ़त के मज़े
वो सरापा नाज़ था बेग़ाना-ए-रस्म-ए-जफ़ाऔर मुझे हासिल थे लुत्फ़े-बे-निहायत के मज़े
हुस्न से अपने वो ग़ाफ़िल था, मैं अपने इश्क़ सेअब कहाँ से लाऊँ वो नावाक़फ़ीयत के मज़े
मेरी जानिब से निगाहे शौक़ की बेताबियाँयार की जानिब से आग़ाज़े-शरारत के मज़े
याद हैं वो हुस्नो-ओ-उल्फ़त की निराली शोख़ियाँइल्तमास-ए-उज़्र-ओ-तमहीद-ए-शिकायत के मज़े
सेहतें लाखों मेरी बीमारी-ए-ग़म पर निसारजिस में उठ्ठे बारहा उनकी अयादत के मज़े
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