ग़ज़ल
चेहराए-यार से नक़ाब उठा
चेहराए-यार से नक़ाब उठादिल से इक शोरे-इज़्तराब उठा
रात पीरे-मुगाँ की महफ़िल सेजो उठा मस्त उठा ख़राब उठा
हम थे बेबाक और वह महजूबशब, ग़रज़, लुत्फ़ बे-हिसाब उठा अपार
मस्ते-सहबाए-शौक़ है ’हसरत’हमनशीं सागरे-शराब उठा
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