ग़ज़ल

वो जब ये कहते हैं तुझ से ख़ता ज़रूर हुई

हसरत मोहानी · सब कलाम देखें
वो जब ये कहते हैं तुझ से ख़ता ज़रूर हुईमैं बे-क़सूर भी कह दूँ कि हाँ ज़रूर हुई
नज़र को ताबे-तमाशाए-हुस्ने यार कहाँये इस ग़रीब को तम्बीहे-बेक़सूर हुई
तुफ़ैले-इश्क है 'हसरत' ये सब मेरे नज़दीकतेरे कमाल की शोहरत जो दूर-दूर हुई
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