ग़ज़ल
इश्क़े-बुतां को जी का जंजाल कर लिया है
इश्क़े-बुताँ को जी का जंजाल कर लिया हैआख़िर में मैंने अपना क्या हाल कर लिया है
संजीदा बन के बैठो अब क्यों न तुम कि पहलेअच्छी तरह से मुझको पामाल कर लिया है
नादिम हूँ जान देकर, आँखों को तूने ज़ालिमरो-रो के बाद मेरे क्यों लाल कर लिया है
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