ग़ज़ल
शिकवए-ग़म तेरे हुज़ूर किया
शिकवए-ग़म तेरे हुज़ूर कियाहमने बेशक बड़ा क़ुसूर किया
दर्दे-दिल को तेरी तमन्ना नेख़ूब सरमायाए-सरूर किया
नाज़े-ख़ूबाँ ने आ़शिक़ों के सिवाआ़रिफ़ों को भी नासबूर किया
यह भी इक छेड़ है कि क़ुदरत नेतुमको ख़ुद-बीं हमें ग़यूर किया
नूरे-अर्ज़ो-समा को नाज़ है यहकि तेरी शक्ल में ज़हूर किया
आपने क्या किया कि 'हसरत' से-न मिले, हुस्न का ग़रूर किया!
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