ग़ज़ल
फिर भी है तुम को मसीहाई का दावा देखो
फिर भी है तुमको मसीहाई का दावा देखोमुझको देखो मेरे मरने की तमन्ना देखो
जुर्मे-नज़्ज़ारा पे कौन इतनी ख़ुशामद करताअब भी वो रूठे हैं लो और तमाशा देखो
दो ही दिन में है न वो बात , न वो चाह, न प्यारहम ने पहले ही ये तुम से न कहा था देखो
हम न कहते थे बनावट से है सारा ग़ुस्साहँस के लो फिर वो उन्होंने हमें देखा देखो
मस्ती-ए-हुस्न से अपनी भी नहीं तुम को ख़बरक्या सुनो अर्ज़ मेरी हाल मेरा क्या देखो
घर से हर वक़्त निकल आते हो खोले हुए बालशाम देखो न मेरी जान सवेरा देखो
ख़ाना-ए-जाँ में नुमुदार है इक पैकर-ए-नूरहसरतो आओ, रुख़े-यार का जल्वा देखो
सामने सबके मुनासिब नहीं हम पर ये इताबसर से ढल जाए न ग़ुस्से में दुपट्टा देखो
मर मिटे हम तो कभी याद भी तुमने न कियाअब महब्बत का न करना कभी दावा देखो
दोस्तो तर्के-महब्बत की नसीहत है फ़ज़ूलऔर न मानो तो दिले-यार को समझा देखो
सर कहीं बाल कहीं हाथ कहीं पाँव कहींउसका सोना भी है किस शान का सोना देखो
अब तो शोख़ी से वो कहते हैं सितमगर हैं जो हमदिल किसी और से कुछ रोज़ ही बहला देखो
हवस-ए-दीद मिटी है न मिटेगी ‘हसरत’देखने के लिए चाहो उन्हें जितना देखो
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh