गुलज़ार
1934-present
सम्पूर्ण सिंह कालरा गुलज़ार हिन्दी सिनेमा के महान गीतकार, कवि और निर्देशक हैं।
दीवान पढ़ें (Read Diwan)
Famous Works
तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी, हैरान हूँ मैं
ओ हैरान हूँ मैं
दो दीवाने शहर में, रात में या दोपहर में
आब-ओ-दाना ढूँढते हैं, एक आशियाना ढूँढते हैं
खुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में
एक पुराना खत खोला अनजाने में
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता था
वो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा था
आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ
आदतन तुम ने कर दिये वादे
आदतन हम ने ऐतबार किया
मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूँ
इक इमारत
है सराय शायद,
चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हें
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी
हम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थे
बस एक चुप-सी लगी है, नहीं उदास नहीं
कहीं पे साँस रुकी है, नहीं उदास नहीं
एक नदी की बात सुनी...
इक शायर से पूछ रही थी
एक परवाज़ दिखाई दी है
तेरी आवाज़ सुनाई दी है
एक पुराना मौसम लौटा याद भरी पुरवाई भी
ऐसा तो कम ही होता है वो भी हों तनहाई भी
एक शरीर में कितने दो हैं,
गिन कर देखो जितने दो हैं।
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं
नज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
काली काली आँखों का
काला काला जादू है
किताबें झाँकती है बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती है
किस क़दर सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता देखो
न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक
कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़का
दबा के पैन्सिल को उंगलियों में
कुछ
खो दिया है
पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख के,
खाली कागज़ पे क्या तलाश करते हो?
एक ख़ामोश-सा जवाब तो है।
ख़ुमानी, अख़रोट बहुत दिन पास रहे थे
दोनों के जब अक़्स पड़ा करते थे बहते दरिया में,
चलो ना भटके
लफ़ंगे कूचों में
चौदहवीं रात के इस चाँद तले
सुरमई रात में साहिल के क़रीब
जंगल जंगल बात चली है पता चला है
जंगल जंगल बात चली है पता चला है
एक बौछार था वो शख्स,
::बिना बरसे किसी अब्र की सहमी सी नमी से
जय हो, जय हो
जय हो, जय हो
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
क़ाफिला साथ और सफ़र तन्हा
ज़ुबान पर ज़ाएका आता था जो सफ़हे पलटने का
अब उँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक
जिहाल-ए-मिस्कीं मुकों बा-रंजिश, बहार-ए-हिजरा बेचारा दिल है,
सुनाई देती हैं जिसकी धड़कन, तुम्हारा दिल या हमारा दिल है।
एक देहाती सर पे गुड की भेली बांधे,
लम्बे- चौडे एक मैदा से गुज़र रहा था
दिल मियाँ मिट्ठू थे
मर्ज़ी के पिट्ठू थे
दरख़्त रोज़ शाम का बुरादा भर के शाखों में
पहाड़ी जंगलों के बाहर फेंक आते हैं !