ग़ज़ल

क़दम उसी मोड़ पर जमे हैं

गुलज़ार · सब कलाम देखें
क़दम उसी मोड़ पर जमे हैंनज़र समेटे हुए खड़ा हूँजुनूँ ये मजबूर कर रहा है पलट के देखूँख़ुदी ये कहती है मोड़ मुड़ जाअगरचे एहसास कह रहा हैखुले दरीचे के पीछे दो आँखें झाँकती हैंअभी मेरे इंतज़ार में वो भी जागती हैकहीं तो उस के गोशा-ए-दिल में दर्द होगाउसे ये ज़िद है कि मैं पुकारूँमुझे तक़ाज़ा है वो बुला लेक़दम उसी मोड़ पर जमे हैंनज़र समेटे हुए खड़ा हूँ
पाठ सत्यापित · Text verified against Kavita Kosh