ग़ज़ल
किस क़दर सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता देखो
किस क़दर सीधा सहल साफ़ है यह रस्ता देखोन किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेकन किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोरन कोई दाग़ जहाँ बैठ के सुस्ताए कोईदूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं
चन्द क़दमों के निशाँ, हाँ, कभी मिलते हैं कहींसाथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चन्द क़दमऔर फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुएअपनी तनहाई लिये आप चलो, तन्हा, अकेलेसाथ आए जो यहाँ, कोई नहीं, कोई नहींकिस क़दर सीधा, सहल साफ़ है यह रस्ता
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