ग़ज़ल
आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँ
आँखों में जल रहा है क्यूँ बुझता नहीं धुआँउठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ
चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गईकुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ
आँखों के पोंछने से लगा आँच का पतायूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ
आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैंमेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ
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