ग़ज़ल

ईंधन

गुलज़ार · सब कलाम देखें
छोटे थे, माँ उपले थापा करती थीहम उपलों पर शक्लें गूँधा करते थेआँख लगाकर - कान बनाकरनाक सजाकर -पगड़ी वाला, टोपी वालामेरा उपला -तेरा उपला -अपने-अपने जाने-पहचाने नामों सेउपले थापा करते थे
हँसता-खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकरगोबर के उपलों पे खेला करता थारात को आँगन में जब चूल्हा जलता थाहम सारे चूल्हा घेर के बैठे रहते थेकिस उपले की बारी आयीकिसका उपला राख हुआवो पंडित था -इक मुन्ना था -इक दशरथ था -बरसों बाद - मैंश्मशान में बैठा सोच रहा हूँआज की रात इस वक्त के जलते चूल्हे मेंइक दोस्त का उपला और गया !
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