ग़ज़ल

एक नदी की बात सुनी...

गुलज़ार · सब कलाम देखें
एक नदी की बात सुनी...इक शायर से पूछ रही थीरोज़ किनारे दोनों हाथ पकड़ कर मेरेसीधी राह चलाते हैंरोज़ ही तो मैंनाव भर कर, पीठ पे लेकरकितने लोग हैं पार उतार कर आती हूँ ।
रोज़ मेरे सीने पे लहरेंनाबालिग़ बच्चों के जैसेकुछ-कुछ लिखी रहती हैं।
क्या ऐसा हो सकता है जबकुछ भी न होकुछ भी नहीं...और मैं अपनी तह से पीठ लगा के इक शब रुकी रहूँबस ठहरी रहूँऔर कुछ भी न हो !जैसे कविता कह लेने के बाद पड़ी रह जाती है,मैं पड़ी रहूँ...!
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