ग़ज़ल
अमलतास
खिड़की पिछवाड़े को खुलती तो नज़र आता थावो अमलतास का इक पेड़, ज़रा दूर, अकेला-सा खड़ा थाशाखें पंखों की तरह खोले हुएएक परिन्दे की तरहबरगलाते थे उसे रोज़ परिन्दे आकरसब सुनाते थे वि परवाज़ के क़िस्से उसकोऔर दिखाते थे उसे उड़ के, क़लाबाज़ियाँ खा केबदलियाँ छू के बताते थे, मज़े ठंडी हवा के!
आंधी का हाथ पकड़ कर शायदउसने कल उड़ने की कोशिश की थीऔंधे मुँह बीच-सड़क आके गिरा है!!
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