ग़ज़ल
कुछ और मंजर-1
कभी कभी लैम्प पोस्ट के नीचे कोई लड़कादबा के पैन्सिल को उंगलियों मेंमुड़े-तुड़े काग़ज़ों को घुटनों पे रख केलिखता हुआ नज़र आता है कहीं तो..ख़याल होता है, गोर्की है!पजामे उचके ये लड़के जिनके घरों में बिजली नहीं लगी हैजो म्यूनिसपैल्टी के पार्क में बैठ कर पढ़ा करते हैं किताबेंडिकेन्स के और हार्डी के नॉवेल से गिर पड़े हैं...या प्रेमचन्द की कहानियों का वर्क है कोई, चिपक गया हैसमय पलटता नहीं वहां सेकहानी आगे बढ़ती नहीं है... और कहानी रुकी हुई है।
ये गर्मियाँ कितनी फीकी होती हैं - बेस्वादी।हथेली पे लेके दिन की फक्कीमैं फाँक लेता हूं...और निगलता हूं रात के ठन्डे घूंट पीकरये सूखा सत्तू हलक से नीचे नहीं उतरता
ये खुश्क़ दिन एक गर्मियों काजस भरी रात गर्मियों की
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