ग़ज़ल

इक जरा छींक ही दो तुम

गुलज़ार · सब कलाम देखें
चिपचिपे दूध से नहलाते हैं, आंगन में खड़ा कर के तुम्हेंशहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्याघोल के सर पे लुढ़काते हैं गिलासियाँ भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में मिल करपाँव पर पाँव लगाए खड़े रहते होइक पथराई सी मुस्कान लिएबुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी
जब धुआँ देता, लगातार पुजारीघी जलाता है कई तरह के छौंके देकरइक जरा छींक ही दो तुमतो यकीं आए कि सब देख रहे हो
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